Thursday, March 14, 2019

जानिए बॉडी बनाने वाले सप्लीमेंट कैसे बन जाते हैं किडनी के लिए जहर

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी डॉक्टर या मेडिकल परामर्श के बिना बॉडी बनाने के लिए जो टॉनिक लेते हैं, वे आपको किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं? रोहित नाम के एक युवा के साथ हुई यह घटना आपकी आंखे खोल देगी कि कैसे हम लोग अपनी बॉडी बनाने के मकसद से बिना किसी चिकित्स्कीय मार्गदर्शन के लंबे समय तक लगातार सप्लीमेंट लेने के कारण अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

एक वयस्क व्यक्ति का सामान्य ब्लड प्रेशर 120/80 mm/hg और 140/90 mm/hg (mm Hg: मिलीमीटर ऑफ मर्क्युरी, ब्लड प्रेशर नापने की यूनिट है) के बीच माना जाता है। जब रोहित को अस्पताल ले जाया गया, तब उनका बीपी 220/140 mm/hg था। इसके अलावा परीक्षणों से पता चला कि उनका क्रिएटिनिन स्तर भी सामान्य से छह गुना अधिक था। डॉक्टर स्वयं एक स्वस्थ, युवा व्यक्ति की ऐसी स्थिति देख कर चकित रह गए। 

(और पढ़ें - क्रिएटिनिन स्तर का टेस्ट कैसा होता है)

पूछताछ पर, डॉक्टर को पता चला कि पश्चिमी दिल्ली के व्यवसायी, रोहित, बॉडी बनाने की चाहत रखते थे और अपने जिम ट्रेनर की सलाह पर चार साल से वर्कआउट से पहले लिए जाने वाले सप्लीमेंट ले रहे थे। इनमें मांसपेशियों की ताकत, ऊर्जा और क्षमता बढ़ाने के लिए कैफीन, एमीनो एसिड और क्रिएटिन जैसे तत्व शामिल थे।

(और पढ़ें - वर्कआउट से पहले क्या खाएं)

वे बताते हैं, "चार साल पहले, मेरे ट्रेनर ने सुझाव दिया कि मुझे अभ्यास से पहले प्री वर्कआउट फॉर्मूला अपनाना चाहिए। इसने मेरे ऊर्जा के स्तर में अचानक वृद्धि कर दी और मैं लंबे समय तक भारी वजन उठा सकता था।"

2003 से जिम जाने वाले 32 वर्षीय रोहित ने कहा कि जब तक किडनी प्रभावित नहीं हुई तब तक उन्होंने चार साल तक हर दिन सप्लीमेंट लिए। वे कहते हैं, "मुझे बाद में पता चला कि आम तौर पर इस तरह की खुराक कम अवधि के लिए या एक समय अंतराल पर ली जाती है।"

जिस हॉस्पिटल में रोहित को एडमिट किया गया वहां के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में नेफ्रोलॉजी और रीनल ट्रांसप्लांट विभाग के निदेशक और प्रमुख के मुताबिक, अगर उनके बीपी को समय रहते दवाओं से कम नहीं किया गया तो रोहित की ब्रेन हैमरेज के कारण मौत हो सकती है। वे बताते हैं, "जब रोहित को अस्पताल में लाया गया तब उनका क्रिएटिनिन का स्तर 6.7 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर की सामान्य सीमा के मुकाबले 0.84-1.21mg था। वे किडनी फेल होने से केवल एक कदम दूर थे, अगर ऐसा हो जाता तो उनको जीवन भर डायलिसिस की आवश्यकता होती।" 

(और पढ़ें - बीपी कम करने के लिए योग)

सौभाग्य से, रोहित के मामले में, सप्लीमेंट का सेवन तत्काल बंद करने, बीपी को नियंत्रित करने के लिए दवा लेने और सही आहार लेने के चलते वे खतरे से बाहर निकल गए। लेकिन अब उन्हें इस बात पर प्रतिबंध के साथ रहना होगा कि वह क्या खा सकता है और कितना व्यायाम कर सकते हैं। डॉक्टर कहते हैं, "किडनी की कार्य क्षमता को पूरी तरह से बहाल नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इसे अधिक खराब होने से रोकने के लिए, रोहित को स्ट्रीट फूड से बचने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि ज्यादा कठिन एक्सरसाइज भी नहीं करना चाहिए, केवल नियमित सैर करें।" 

(और पढ़ें - सुबह सैर करने के फायदे)

डॉक्टर ने कहा कि अस्पताल में सभी किडनी रोगियों में से 10% ऐसा युवा हैं जो सप्लीमेंट के अत्यधिक प्रयोग के शिकार हैं। वे बताते हैं, "हेल्थ सप्लीमेंट के लंबे समय तक उपयोग के कारण मेरे कम से कम तीन रोगियों की किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी हैं और अब वे डायलिसिस पर हैं।"

दिल्ली के प्रसिद्ध लिवर एंड बायलरी साइंस इंस्टिट्यूट में नेफ्रोलॉजी के प्रमुख ने बिना चिकित्सकीय देखरेख के अक्सर सप्लीमेंट का उपयोग करने वाले युवाओं की संख्या में तेजी से हो रही वृद्धि के बारे में चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, "कभी भी किसी डॉक्टर या योग्य पेशेवर की सलाह के बिना प्री-वर्कआउट सप्लीमेंट या प्रोटीन सप्लीमेंट नहीं लेना चाहिए। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण, इस तरह की प्रथा चल रही है और जो आमतौर पर पूरी तरह स्वस्थ व्यक्तियों का भी स्वास्थ्य संकट में डाल रही है।"

एक बड़े फिटनेस सेंटर के प्रबंध निदेशक ने कहा, जिम जाने वाले लगभग 20% पुरुष ऐसे सप्लीमेंट लेते हैं। वे कहते हैं, "अधिक प्रोटीन वाली ड्रिंक्स लेना भी आम हैं। डॉक्टर की देखरेख में या चिकित्सा पेशेवर के मार्गदर्शन में इनका सेवन किया जाए तो अच्छा रहता है।" 

(और पढ़ें - प्रोटीन पाउडर कितनी मात्रा में लेना चाहिए)

नोट: यह लेख एक सच्ची घटना पर आधारित है, लेकिन रोगी की पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से उनका नाम और अन्य निजी जानकारियां बदली गयी है। यह लेख लिखने के पीछे हमारा मुख्य उदेश्य केवल हमारे पाठकों को जागरूक करना है। 



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Thursday, March 7, 2019

घुटने बदलने का ऑपरेशन या घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी - Knee Replacement Surgery (Knee Arthroplasty) in Hindi

घुटने की समस्या और उससे होने वाले दर्द के उपचार के लिए की जाने वाली शल्यचिकित्सा (सर्जरी) को घुटनों की अर्त्रोप्लास्टी (Knee Arthroplasty) या घुटनों को बदलने की सर्जरी (Knee Replacement Surgery) कहा जाता है। अर्त्रोप्लास्टी का अर्थ है "जोड़ों की शल्यचिकित्सा" इसलिए, Knee Replacement Surgery है घुटने के जोड़ों की शल्यचिकित्सा। Knee Replacement Surgery में खराब जोड़ों (जिन जोड़ों में परेशानी है) को एक कृत्रिम धातु के जोड़ों (Artificial Metallic Joint) के साथ बदल दिया जाता है। 



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Homeopathic medicine, treatment and remedies for Shortness of Breath

Shortness of breath, also called dyspnea, refers to a feeling of suffocation or an inability or difficulty in breathing. Most commonly, breathing difficulties are reported at high altitudes, but depending on the physical and physiological condition of an individual, it may also occur while climbing stairs, walking, running and, in severe cases, standing for a long time. It can happen suddenly or develop gradually over weeks to months. Shortness of breath primarily occurs due to problems related to the heart or lungs. These organs are responsible for supplying the body with oxygen and removing carbon dioxide from tissues and blood. Any imbalance in the levels of oxygen, carbon dioxide and haemoglobin directly impact the normal functioning of body. Common conditions that cause shortness of breath are asthma, chronic obstructive pulmonary disease, allergic reactions, low blood pressure, anaemia, enlarged heart, coronary heart disease, and choking.

Homeopathic texts describe several remedies for treating conditions that lead to shortness of breath. Medicines such as blatta orientalis, ipecacuanha, lobelia inflata and antimonium tartaricum, are carefully matched with symptoms and personality of the individual and then prescribed to achieve an overall improvement in health. 



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Wednesday, March 6, 2019

ईएमजी टेस्ट - Electromyography (EMG) in Hindi

क्या आपके डॉक्टर ने आपको कभी EMG नामक कोई जांच करवाने का आदेश दिया है? यदि ऐसा हुआ है तो आप जरूर जानते होंगे कि इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) यानी ईएमजी मांसपेशियों के स्वास्थ्य की स्थिति और उन्हें नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं का मूल्यांकन करने की एक जांच ​​प्रक्रिया है। इन तंत्रिका कोशिकाओं को मोटर न्यूरॉन्स के रूप में जाना जाता है। ये तंत्रिका कोशिकाएं विद्युत संकेतों को संचारित करती हैं, जिनसे मांसपेशियों में संकुचन तथा सामान्य स्थिति बहाल होती है। ईएमजी टेस्ट इन संकेतों को ग्राफ या संख्याओं में बदलता है, जिससे डॉक्टरों को रोग का पता करने में मदद मिलती है।

(और पढ़ें - सीए 27.29 टेस्ट क्या है)

डॉक्टर आमतौर पर ईएमजी टेस्ट करवाने के लिए तब कहते हैं, जब किसी व्यक्ति में मांसपेशी या तंत्रिका विकार के लक्षण दिख रहे हो। मांसपेशी या तंत्रिका विकार के कारण अंगों में झुनझुनी, सुन्नता या कमजोरी जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं। ईएमजी टेस्ट के परिणाम डॉक्टर को मांसपेशियों के विकारों, तंत्रिका विकारों तथा नसों और मांसपेशियों के बीच संबंध को प्रभावित करने वाले विकारों का निदान करने में मदद कर सकते हैं। कुछ डॉक्टर इलेक्ट्रोमायोग्राफी को इलेक्ट्रोडायग्नॉस्टिक एग्जाम भी कहते हैं।

इस लेख में ईएमजी टेस्ट क्या है, कब किया जाता है, ईएमजी टेस्ट के पहले, दौरान और बाद में क्या होता है और ईएमजी टेस्ट के परिणामों को कैसे समझे इसके बारे में विस्तार से बताया गया है।

(और पढ़ें - नसों की कमजोरी का इलाज)



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सीए 27.29 टेस्ट - CA 27.29 Test in Hindi

परिचय

सीए 27.29 (कैंसर एंटीजन 27.2)  एक एंटीजन होता है। यह प्रोटीन का एक प्रकार है, जो कोशिकाओं की सतह पर मौजूद होता है। सीए 27.29 को एक जीन के द्वारा बनाया जाता है सीए 27.29 एक ग्लाइकोप्रोटीन (ग्लाइको का मतलब शुगर होता है) है, जो खासतौर पर एपिथेलियल सेल्स (Epithelial cells) के ऊपर स्थित होता है। ब्रेस्ट कैंसर की कोशिकाएं सीए 27.29 प्रोटीन में और खून में मिल जाती है।

(और पढ़ें - सीए 125 टेस्ट क्या है)



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सीए 19.9 टेस्ट - CA 19.9 Test (Pancreatic Cancer Marker, Serum) in Hindi

परिचय

एंटीजन एक ऐसा पदार्थ होता है जिसके कारण प्रतिरोधक क्षमता किसी रोग या संक्रमण के प्रति प्रतिक्रिया देती है। कार्बोहाइड्रेट एंटीजन सीए 19-9 एक प्रकार का एंटीजन होता है जो अग्नाशय की कैंसर कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित किया जाता है। इसको ट्यूमर मार्कर भी कहा जाता है। ट्यूमर मार्कर वे पदार्थ होते हैं जो शरीर में कैंसर होने की प्रतिक्रिया के रूप में सामान्य कोशिकाओं या कैंसर कोशिकाओं द्वारा बनाए जाते हैं। यह एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो कुछ कैंसर कोशिकाओं की सतह पर पाए जाते हैं। जब यह कैंसर कोशिकाओं से स्त्रावित होता है, तो यह खून में भी पाया जाता है। 

जो लोग स्वस्थ होते हैं उनके खून में कम मात्रा में सीए 19-9 पाया जाता है। यदि किसी व्यक्ति में सीए 19-9 का स्तर अधिक हो तो यह अग्नाशय कैंसर का संकेत दे सकता है। लेकिन कभी-कभी सीए 19-9 का अधिक स्तर अन्य कैंसर या अन्य कई विकारों का संकेत भी दे सकता है जैसे सिरोसिस और पित्त में  पथरी आदि।

(और पढ़ें - पित्ताशय की सूजन का कारण)



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सीए 15.3 टेस्ट - CA 15.3 (Breast Cancer Marker, Serum)

परिचय

सीए 15-3 एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो स्तन के ऊतकों का सामान्य उत्पाद होता है। सीए 15-3 प्रोटीन स्तन कैंसर का कारण नहीं बनता है। लेकिन अगर स्तन में कैंसर युक्त ट्यूमर विकसित हो गया है, तो कोशिकाओं के साथ-साथ सीए 15-3 का स्तर भी बढ़ जाता है। सीए 15-3 एक प्रकार का एंटीजन या एक ऐसा पदार्थ होता है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करता है। कुछ प्रकार की कैंसर कोशिकाएं सीए 15-3 एंटीजन को खून में स्त्रावित कर देती हैं। 

सीए 15-3 का इस्तेमाल ट्यूमर मॉनिटर के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग आमतौर पर ब्रेस्ट कैंसर के रोगी की प्रतिक्रिया और कैंसर फिर से होने आदि जैसी स्थितियों का पता लगाया जाता है।

सीए 15-3 का सामान्य स्तर क्या है?

सीए 15-3 की सामान्य सीमा 30 यू/एमएल से कम होती है। इसकी ऊपरी सीमा लेबोरेटरी और टेस्ट करने के लिए किस प्रकार की किट का इस्तेमाल किया जाता है इस पर निर्भर करती है। अलग-अलग किट, तरीकों व लेबोरेटरी से निकाले गए स्तर के मान को एक दूसरे की जगह पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

(और पढ़ें - स्तन कैंसर की सर्जरी)



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सीए 125 टेस्ट - CA 125 Test in Hindi

सीए (CA) का मतलब कैंसर एंटीजन (Cancer antigen) होता है। सीए 125 खून में पाया जाने वाला एक प्रोटीन होता है। विशेष रूप से सीए 125 शरीर के अन्य हिस्सों के मुकाबले ओवेरियन (अंडाशय/डिम्बग्रंथि) कैंसर की कोशिकाओं में अधिक मात्रा में पाया जाता है। सीए 125 की पहचान 1980 के दशक की शुरुआत में की गई थी और शरीर में इसके महत्व व कार्यों के बारे में अब तक पता नहीं चल पाया है। सीए 125 के स्तर को मापने के लिए सीए 125 टेस्ट किया जाता है, जो एक सामान्य खून टेस्ट की तरह किया जाता है।

(और पढ़ें - सीआरपी ब्लड टेस्ट क्या है)



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एल्बुमिन टेस्ट - Albumin Test

परिचय:

प्रोटीन खून में पाया जाने वाला एक पदार्थ है, जो खून के माध्यम से ही आपके पूरे शरीर में सर्कुलेट होता हैं और शरीर में तरल का संतुलन बनाने में मदद करता हैं। यह खुद ही एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जिसे लिवर द्वारा बनाया जाता है। गौरतलब है कि एल्बुमिन खून में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन होता है। 

एल्बुमिन भी शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह रक्त वाहिकाओं में अधिक रिसाव होने से रोकथाम करता है। इसके अलावा यह ऊतकों को स्वस्थ बनाने और महत्वपूर्ण हार्मोन व पोषक तत्वों को शरीर में पहुंचा कर शरीर के बढ़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । 

जब किसी समस्या के कारण लिवर की एल्बुमिन बनाने की क्षमता प्रभावित हो जाती है, तो एल्बुमिन का स्तर कम या बहुत अधिक कम हो जाता है। इसके अलावा प्रोटीन का अवशोषण बढ़ने, प्लाज्मा की मात्रा बढ़ने या किडनी संबंधी समस्याओं के कारण प्रोटीन कम होने लगना आदि जैसी समस्याओं के परिणामस्वरूप भी एल्बुमिन का स्तर कम होने लगता है।

(और पढ़ें - लिवर खराब होने के लक्षण)



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सीडी 4 टेस्ट - CD4 Test in Hindi

परिचय

खून में सीडी 4 टेस्ट एक ऐसा टेस्ट है, जो यह बताता है कि खून में कितनी मात्रा में सीडी 4 कोशिकाएं मौजूद हैं। सीडी 4 कोशिकाएं एक प्रकार की रक्त कोशिकाएं होती हैं। इन्हें टी कोशिकाएं (T cells)  भी कहा जाता है। ये कोशिकाएं खून के माध्यम से आपके पूरे शरीर में घूमती हैं और बैक्टीरिया, वायरस व अन्य रोगाणुओं को नष्ट करती हैं। 

ये कोशिकाएं रोगों से लड़ती हैं। लिम्फोसाइट एक प्रकार की सफेद रक्त कोशिका होती है, जिसकी दो श्रेणियां होती हैं टी कोशिका (T cells) और बी कोशिका (B cells)। टी कोशिकाएं वायरल इन्फेक्शन से लड़ती है और प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाती है, जबकि बी कोशिकाएं बैक्टीरियल इन्फेक्शन से लड़ती है। 

कभी-कभी शरीर में सीडी 4 कोशिकाओं की मात्रा बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाती है। इसका मतलब होता है कि आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से काम नहीं कर पा रही है। 

यदि आप एचआईवी से ग्रस्त हैं, तो असरदार एंटीवायरल ट्रीटमेंट लेकर आप अपना सीडी 4 कोशिकाओं की संख्या सामान्य रख सकते हैं और एचआईवी के लक्षणों व उससे होने वाली अन्य समस्याओं को कंट्रोल में रख सकते हैं साथ ही लंबे समय तक जीवन जी सकते हैं।

अध्ययन के द्वारा यह पता चला है कि एचआईवी से ग्रस्त जो व्यक्ति नियमित रूप से अपने उपचार करवाते हैं, वे एक स्वस्थ व्यक्ति (जो एचआईवी से ग्रस्त नहीं हैं) की तरह जीवन जी सकते हैं।

कुछ लोगों में सीडी 4 कोशिकाओं की संख्या बहुत कम होती है। ऐसे लोगों को एंटीवायरल दवाओं के साथ-साथ कुछ विशेष प्रकार की दवाएं लेने की आवश्यकता पड़ सकती है, जो कुछ विशेष प्रकार के संक्रमणों की रोकथाम करती हैं। जब एंटीवायरल दवाओं की मदद से सीडी 4 कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है।

(और पढ़ें - लिम्फोमा के लक्षण)



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मनोवैज्ञानिक परीक्षण - Psychological Testing in Hindi

परिचय

“मनोवैज्ञानिक परीक्षण” (साइकोलॉजिकल टेस्टिंग) टेस्टों की एक ऐसी श्रंखला या सीरीज होती है जिसमें कई प्रकार के “मनोवैज्ञानिक टेस्ट” (साइकोलॉजिकल टेस्ट) किये जाते हैं। ये टेस्ट विशेष रूप से किसी व्यक्ति में उसके व्यवहार की जांच करते हैं, जिसे “सेंपल ऑफ बिहेवियर” कहा जाता है। जब किसी व्यक्ति को कोई काम दिया जाता है, तो उस काम पर व्यक्ति के प्रदर्शन को व्यवहार का सेंपल या उदाहरण कहा जाता है। व्यवहार के कुछ सेंपल ऐसे टेस्ट के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं जिनमें मरीज को कुछ लखना-पढ़ना होता है। ये मनोवैज्ञानिक परीक्षण के सबसे आम टेस्टों में से हैं। टेस्टों में मरीज से पेंसिल और पेपर से काम करवाया जाता है, जिससे मनोवैज्ञानिक परीक्षण के परिणाम निकाले जाते हैं। 

(और पढ़ें - मनोचिकित्सा क्या है)

ऐसा माना जाता है कि अच्छी तरह से किया गया टेस्ट व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक रचना को दर्शाता है, जैसे स्कूल के किसी विषय में प्रदर्शन, संज्ञानात्मक क्षमता, योग्यता, भावनात्मक और व्यक्तित्व स्थिति आदि। टेस्ट के रिजल्ट में किसी प्रकार का बदलाव, मरीज की मनोवैज्ञानिक रचना में बदलाव दर्शाता है। हालांकि जिस मनोवैज्ञानिक रचना का टेस्ट किया गया है उसी के बदलाव का पता लगाया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण के पीछे के विज्ञान को “साइकोमेट्रिक्स” (Psychometrics) कहा जाता है।

(और पढ़ें - मानसिक रोग के लक्षण)



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एलिसा टेस्ट - ELISA Test in Hindi

एलिसा टेस्ट के द्वारा यह पता लगाया जाता है, कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली सूक्ष्म रोगाणुओं के प्रति क्या प्रतिक्रिया कर रही है। इस टेस्ट के द्वारा प्रतिरक्षा प्रणाली में उपस्थित केमिकल व अन्य तत्वों की जांच की जाती है। एलिसा टेस्ट में एक एंजाइम होता है (एक प्रोटीन जो बायोकेमिकल रिएक्शन को बढ़ाता है)।

एलिसा टेस्ट की मदद से शरीर में एंटीबॉडीज या एंटीजन की जांच की जाती है। एंटीबॉडीज शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा किसी रोग या संक्रमण से लड़ने के लिए बनाए जाते हैं और एंटीजन एक बाहरी पदार्थ होता है तो प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण या रोगों के खिलाफ उत्तेजित (जैसे एंटीबॉडीज बनाने के लिए उत्तेजित करना) करता है।

(और पढ़ें - बैक्टीरियल संक्रमण के लक्षण)

आगे इस लेख में आपको एलिसा टेस्ट के बारे में बताया जा रहा है। आप जानेंगे कि एलिसा टेस्ट को कब, क्यों और कैसे किया जाता है, और साथ ही इसका खर्च कितना होता है। आप यह भी जानेंगे कि इस टेस्ट से पहले क्या तयारी करनी होती है और एलिसा टेस्ट के बाद सावधानियां क्या बरतनी होती है। 



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प्रोलैक्टिन परीक्षण - Prolactin Test in Hindi

प्रोलैक्टिन एक हार्मोन होता है जो मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्रंथि के द्वारा बनाया जाता है। जब कोई महिला गर्भवती होती है या जब शिशु को जन्म देती है, तो उनके प्रोलैक्टिन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। प्रोलैक्टिन का स्तर बढ़ने से महिलाओं के स्तनों में दूध बनने लगता है। यदि आप गर्भवती नहीं हैं और यहां तक कि अगर आप पुरुष हैं, तो भी प्रोलैक्टिन का स्तर बढ़ जाना संभव होता है। 

(और पढ़ें - माँ का दूध बढ़ाने के तरीके)

यह हार्मोन पुरुषों व महिलाओं दोनों के प्रजनन स्वास्थ्य के लिए जरूरी होता है। किसी व्यक्ति के खून में प्रोलैक्टिन के स्तर की कम या ज्यादा मात्रा उसकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित भी कर सकती है। इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है कि पुरुषों में प्रोलैक्टिन के मुख्य काम क्या होते हैं। हालांकि प्रोलैक्टिन परीक्षण का उपयोग पुरुषों और महिलाओं दोनों में यौन संतुष्टि को मापने के लिए किया जाता है। हार्मोन के कारण होने वाली अन्य समस्याओं का पता लगाने के लिए भी प्रोलैक्टिन परीक्षण की मदद ली जा सकती है। 

खून के सेंपल में प्रोलैक्टिन के स्तर की जांच करने के बाद डॉक्टर समस्या के लिए संभव इलाज का सुझाव दे सकते हैं। 

(और पढ़ें - यौन शक्ति बढ़ाने के उपाय)



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बोन डेंसिटी टेस्ट (डेक्सा स्कैन) - Bone Density Test (Dexa Scan) in Hindi

बोन डेंसिटी टेस्ट को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि ओस्टियोपोरोसिस (हड्डियों को कमजोर करने वाला रोग) कैसे होता है।

हड्डी जीवित ऊतकों से बनी होती है। इसमें पुराने ऊतक खत्म होते रहते हैं और उनकी जगह पर नए जमा होते रहते हैं। ज्यादातर हड्डियां वयस्कता के शुरुआत तक ही पूरी तरह विकसित हो जाती हैं। इसके बाद बोन डेंसिटी धीरे-धीरे कम होती रहती है। पुरुषों व महिलाओं दोनों में उम्र के साथ बोन डेंसिटी कम होने की एक सामान्य दर होती है। महिलाओं में उम्र बढ़ने के अलावा रजोनिवृत्ति भी बोन डेंसिटी को कम करने का कारण बन सकती है। रजोनिवृत्ति के बाद शुरुआती 3 से 6 सालों में हड्डियों में काफी नुकसान होता है।

(और पढ़ें - रजोनिवृत्ति के घरेलू उपाय)

इस टेस्ट में एक्स रे तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक सुरक्षित, दर्द रहित और जल्दी होने वाला टेस्ट होता है जो हड्डियों की मजबूती को मापता है। इसके अलावा बोन डेंसिटी टेस्ट, ओस्टियोपोरोसिस विकसित होने से पहले ही हड्डी में किसी प्रकार के फ्रैक्चर की संभावनाओं को बता देता है। 

(और पढ़ें - हड्डी फ्रैक्चर के लक्षण)

आगे इस लेख में आपको बोन डेंसिटी टेस्ट के बारे में बताया जा रहा है। आप जानेंगे कि बोन डेंसिटी टेस्ट को कब, क्यों और कैसे किया जाता है, और साथ ही इसका खर्च कितना होता है। आप यह भी जानेंगे कि बोन डेंसिटी टेस्ट से पहले क्या तयारी करनी होती है और इसके बाद क्या सावधानी बरतनी होती है। 



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हीमोग्लोबिन टेस्ट - Hemoglobin (Hb) Test in Hindi

हीमोग्लोबिन को कभी-कभी एचबी (Hb) भी कहा जाता है, यह एक "कॉम्प्लेक्स प्रोटीन" होता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है और इसमें आयरन के अणु पाए जाते है। हीमोग्लोबिन का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर के ऊतकों तक ले जाना होता है। कार्बन डाइऑक्साइड की जगह पर ऊतकों (टिशूस) तक ऑक्सीजन पहुंचाना और कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक ले जाना भी हीमोग्लोबिन का ही काम होता है, जहां से कार्बन डाइऑक्साइड को वापस शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। हीमोग्लोबिन में उपस्थित आयरन, लाल रक्त कोशिकाओं की सामान्य आकृति बनाए रखने में मदद करते हैं।

(और पढ़ें - हीमोग्लोबिन की कमी)

आगे इस लेख में आपको हेलोग्लोबिन के टेस्ट के बारे में बताया जाएगा - इसको कब, क्यों और कैसे किया जाता है, और साथ ही इसका खर्च कितना होता है। आप यह भी जानेंगे कि इस टेस्ट से पहले क्या तयारी करनी होती है और हीमोग्लोबिन टेस्ट के बाद सावधानियां क्या बरतनी होती है। 



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ब्लड ग्रुप टेस्ट - Blood Group Test in Hindi

हर व्यक्ति के खून की बनावट एक ही होती है, लेकिन फिर भी खून के कई प्रकार होते हैं। खून अाठ अलग-अलग प्रकार का होता है जिन्हें ब्लड ग्रुप कहा जाता है। आपका ब्लड ग्रुप कौन सा होगा, यह आपके जीन पर निर्भर करता है, जो आपको माता-पिता से मिलते हैं।

खून का प्रकार इस पर निर्धारित करता है कि लाल रक्त कोशिकाओं में कुछ विशेष प्रकार के प्रोटीन हैं या नहीं। इन प्रोटीन को एंटीजन कहा जाता है।

ब्लड ग्रुप काफी मायने रखता है, क्योंकि खून के सभी प्रकार एक दूसरे के प्रति अनुकूल नहीं होते। यह कई मेडिकल परिस्थितियों में काफी महत्वपूर्ण होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति में खून चढ़ाने की आवश्यकता है तो उसे खून का ऐसा प्रकार चढ़ाया जाना चाहिए जो उसके लिए अनुकूल हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि खून का गलत प्रकार चढ़ाने से मरीज का इम्यून सिस्टम कुछ ऐसे रिएक्शन कर सकता है जिनसे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं, यहाँ तक कि मौत भी हो सकती है। 

(और पढ़ें - खून की जांच)

इसलिए ब्लड ग्रुप पता करने के लिए ब्लड ग्रुप टेस्ट किया जाता है। आगे इस लेख में ब्लड ग्रुप टेस्ट के बारे में विस्तार से बताया गया है।



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ब्रोंकोस्कोपी - Bronchoscopy in Hindi

ब्रोंकोस्कोपी क्या होती है?

ब्रोंकोस्कोपी एक एसी प्रक्रिया होती है जिसकी मदद से डॉक्टर श्वसन मार्गों और फेफड़ों की जांच करते हैं। ब्रोंकोस्कोपी आमतौर उन डॉक्टरों के द्वारा की जाती है जो फेफड़ों से संबंधित समस्याओं के विशेषज्ञ (Pulmonologist) होते हैं। ब्रोंकोस्कोपी की प्रक्रिया के दौरान एक पतली ट्यूब जिसे ब्रोंकोस्कोप (Bronchoscope) कहा जाता है उसे नाक या मुंह के माध्यम से गले मे डाला जाता है। 

ब्रोंकोस्कोपी में आमतौर पर लचीले ब्रोंकोस्कोप का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि कुछ ऐसे मामले भी हैं जिनमें कठोर ब्रोंकोस्कोप का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि फेफड़ों में अत्यधिक खून बहना या गले में कुछ फंस जाना।

यदि आपको लगातार संक्रमण या खांसी हो रही है या फिर एक्स रे के दौरान फेफड़ों में कुछ असाधारण दिखाई देता है तो डॉक्टर आमतौर पर ब्रोंकोस्कोपी करवाने का सुझाव देते हैं। 

इसके अलावा ब्रोंकोस्कोपी का इस्तेमाल कफ (बलगम) या गले व फेफड़ों से ऊतकों का सेंपल लेने के लिए किया जाता है। यदि आपके श्वसन मार्ग गले में कुछ फंस गया है तो उसको निकालने के लिए भी ब्रोंकोस्कोपी का इस्तेमाल किया जाता है।

(और पढ़ें - कफ निकालने के उपाय)



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कोलोनोस्कोपी - Colonoscopy in Hindi

कोलोनोस्कोपी एक ऐसा टेस्ट है जिसका इस्तेमाल बड़ी आंत या गुदा में किसी प्रकार की खराबी या अन्य असामान्यताओं का पता लगाने के लिए किया जाता है। 

कोलोनोस्कोपी के दौरान मरीज की बड़ी आंत में गुदा के माध्यम से एक लंबी और लचीली ट्यूब डाली जाती है इस ट्यूब को कोलोनोस्कोप (Colonoscope) कहा जाता है। इस ट्यूब के अगले सिरे पर एक छोटा सा कैमरा लगा होता है जिसकी मदद से डॉक्टर गुदा के अंदर देख पाते हैं। 

यदि कोलन (बड़ी आंत) या गुदा में कोई असाधारण ऊतक या मांस बढ़ा हुआ है तो कोलोनोस्कोप की मदद से उसको हटाया जा सकता है। इसके अलावा कोलोनोस्कोपी के दौरान ऊतकों के सेंपल भी लिये जा सकते हैं। इन सेंपल को लेबोरेटरी में टेस्टिंग के लिए भेजा जाता है।

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